संक्षिप्त उत्तर: दिल्ली में चेक बाउंस
चेक बाउंस होना परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत अपराध है, यदि भुगतान पाने वाला बैंक का रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिन के भीतर लिखित डिमांड नोटिस भेजे और चेक देने वाला नोटिस मिलने के 15 दिन में भुगतान न करे। इसके बाद एक महीने के भीतर शिकायत दर्ज करनी होती है। दिल्ली में शिकायत उस मजिस्ट्रेट के यहाँ दर्ज होती है जिसके क्षेत्र में भुगतान पाने वाले का वह बैंक ब्रांच है जहाँ चेक जमा किया गया था (धारा 142(2))। धारा 143A के तहत अदालत चेक राशि का 20% तक अंतरिम मुआवज़ा दिलवा सकती है। Law Chambers of Mridul Jindal दिल्ली में ये मामले देखता है। कॉल करें: +91-8800669834।
लेखन और समीक्षा: एडवोकेट मृदुल जिंदल, बार काउंसिल ऑफ दिल्ली में पंजीकृत (2021) · अंतिम अपडेट 01.11.2026
दिल्ली में चेक बाउंस केस कहाँ दर्ज करें?
अधिकार क्षेत्र इस बात से तय होता है कि भुगतान पाने वाले ने चेक किस बैंक ब्रांच में जमा किया, न कि चेक देने वाला कहाँ रहता है। उदाहरण के लिए, ब्रांच पूर्वी दिल्ली में है तो शिकायत कड़कड़डूमा कोर्ट में जाएगी, दक्षिणी दिल्ली में है तो साकेत कोर्ट में। दिल्ली के हर जिले में NI Act की शिकायतें सुनने वाली मजिस्ट्रेट अदालतें हैं। जिलेवार कोर्ट परिसरों के लिए हमारी दिल्ली कोर्ट गाइड देखें।
भुगतान पाने वाले के लिए चरण
- डिमांड नोटिस: रिटर्न मेमो के 30 दिन के भीतर, चेक का विवरण और राशि लिखकर।
- शिकायत: 15 दिन की भुगतान अवधि खत्म होने के बाद एक महीने के भीतर, चेक, रिटर्न मेमो, नोटिस और डिलीवरी के प्रमाण के साथ।
- अंतरिम मुआवज़ा: मुकदमे के दौरान धारा 143A के तहत चेक राशि के 20% तक के लिए आवेदन।
- वसूली: दोषसिद्धि पर अदालत चेक राशि के दोगुने तक जुर्माना और मुआवज़ा दे सकती है; साथ में दीवानी वसूली मुकदमा भी चल सकता है।
चेक देने वाले के लिए बचाव और समझौता
चेक देने वाला केस का विरोध कर सकता है, जैसे कि चेक कानूनी रूप से वसूली योग्य कर्ज़ के लिए नहीं दिया गया था, नोटिस में कमी थी या शिकायत देर से दर्ज हुई। लेकिन कानून मानकर चलता है कि चेक कर्ज़ के लिए दिया गया (धारा 139), इसलिए इसे खंडित करने के लिए सबूत चाहिए। यह अपराध धारा 147 के तहत समझौता योग्य है, और सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआती समझौते को प्रोत्साहित किया है (Damodar S. Prabhu v. Sayed Babalal, 2010)। दोषसिद्धि के खिलाफ अपील में धारा 148 के तहत जुर्माना या मुआवज़े का कम से कम 20% जमा करने का निर्देश दिया जा सकता है।
कौन से दस्तावेज़ तैयार रखें
- चेक और मेमो: मूल चेक और बैंक का रिटर्न मेमो।
- नोटिस: डिमांड नोटिस की कॉपी, डाक या कूरियर की रसीद और ट्रैकिंग।
- लेन-देन का प्रमाण: बिल, लोन एग्रीमेंट, बैंक ट्रांसफर या कर्ज़ दिखाने वाले मैसेज।
संबंधित सेवाएँ
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
उस मजिस्ट्रेट कोर्ट में जिसके क्षेत्र में आपका वह बैंक ब्रांच है जहाँ चेक वसूली के लिए जमा किया गया था, NI Act की धारा 142(2) के तहत।
बैंक का रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिन के भीतर डिमांड नोटिस भेजना होता है। चेक देने वाले के पास भुगतान के लिए 15 दिन होते हैं, और उसके बाद एक महीने में शिकायत दर्ज करनी होती है।
हाँ। धारा 143A के तहत अदालत चेक राशि का 20% तक अंतरिम मुआवज़ा देने का आदेश दे सकती है, जो चेक देने वाले के बरी होने पर लौटाना होता है।
हाँ। धारा 147 के तहत यह अपराध समझौता योग्य है और किसी भी चरण पर, लोक अदालत या मध्यस्थता में भी, समझौता हो सकता है।
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