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चेक बाउंस: धारा 138 के तहत अपराध

चेक बाउंस होना केवल पैसे का विवाद नहीं है। परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act), 1881 की धारा 138 के तहत यह एक अपराध है। लॉ चैंबर्स ऑफ़ मृदुल जिंदल गाजियाबाद, नोएडा और दिल्ली की अदालतों में धारा 138 के मामले देखता है, चाहे आप चेक पाने वाले (शिकायतकर्ता) हों या चेक देने वाले (आरोपी)।

ज़रूरी समय-सीमाएँ

  1. चेक उसकी वैधता अवधि में, यानी उस पर लिखी तारीख से तीन महीने के भीतर, बैंक में प्रस्तुत होना चाहिए।
  2. चेक लौटने पर बैंक का रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिन के भीतर चेक देने वाले को लिखित कानूनी नोटिस भेजना ज़रूरी है।
  3. नोटिस मिलने के 15 दिन के भीतर भुगतान न होने पर अपराध बनता है।
  4. उसके बाद एक महीने के भीतर मजिस्ट्रेट की अदालत में शिकायत दायर करनी होती है (धारा 142)।

इनमें से कोई समय-सीमा चूकने पर मामला कमज़ोर हो सकता है, इसलिए कानूनी नोटिस भेजने से पहले ही सलाह लेना बेहतर है।

सज़ा और अंतरिम मुआवज़ा

धारा 138 के तहत दो साल तक की कैद, या चेक की राशि के दोगुने तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। मुकदमे के दौरान अदालत चेक राशि के 20% तक अंतरिम मुआवज़ा देने का आदेश दे सकती है (धारा 143A), और सज़ा के विरुद्ध अपील में भी कम से कम 20% राशि जमा कराई जा सकती है (धारा 148)।

शिकायत किस अदालत में दायर होगी?

2015 के संशोधन के बाद शिकायत उस क्षेत्र की अदालत में दायर होती है जहाँ चेक पाने वाले का वह बैंक खाता है, जिसमें चेक भुगतान के लिए जमा किया गया था।

अगर आपको धारा 138 का नोटिस या समन मिला है

नोटिस या समन को नज़रअंदाज़ न करें। समय पर जवाब देना और अदालत में पेश होना ज़रूरी है। बचाव मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है, जैसे चेक किसी कानूनी रूप से वसूली योग्य कर्ज़ के लिए न दिया गया हो, नोटिस में कमी हो, या समय-सीमाओं का पालन न हुआ हो। कई मामलों में समझौता भी हो जाता है, क्योंकि यह अपराध समझौता-योग्य है (धारा 147)।

हम किस तरह सहायता करते हैं

  • कानूनी नोटिस का मसौदा तैयार करना और भेजना
  • शिकायत दायर करना और साक्ष्य प्रस्तुत करना
  • आरोपी की ओर से बचाव, जमानत और समन से जुड़ी कार्यवाही
  • अंतरिम मुआवज़ा और अपील
  • समझौता, मध्यस्थता और लोक अदालत में निपटारा
  • ज़रूरत हो तो रकम की वसूली के लिए दीवानी मुकदमा (CPC आदेश 37 के तहत सारांश वाद)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चेक बाउंस होने पर नोटिस कब तक भेजना होता है?

बैंक का रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिन के भीतर चेक देने वाले को लिखित नोटिस भेजना ज़रूरी है।

क्या चेक बाउंस में जेल हो सकती है?

हाँ, धारा 138 में दो साल तक की कैद का प्रावधान है। व्यवहार में कई मामले भुगतान या समझौते से निपट जाते हैं।

क्या चेक बाउंस के मामले में समझौता हो सकता है?

हाँ। धारा 147 के तहत यह अपराध समझौता-योग्य है और मामले के किसी भी चरण में समझौता किया जा सकता है।

क्या सिक्योरिटी चेक बाउंस होने पर भी मामला बनता है?

यह तथ्यों पर निर्भर करता है। यदि चेक प्रस्तुत करते समय कोई कानूनी रूप से वसूली योग्य कर्ज़ बकाया था, तो सिक्योरिटी के रूप में दिए गए चेक पर भी धारा 138 का मामला बन सकता है।

यह जानकारी सामान्य जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं। आपके मामले के तथ्यों के अनुसार सलाह अलग हो सकती है।