संक्षेप में: NDPS केस

नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज़ एक्ट, 1985 के तहत सज़ा और जमानत की संभावना इस पर निर्भर करती है कि बरामद मात्रा कम, मध्यम या व्यावसायिक है; व्यावसायिक मात्रा में धारा 37 जमानत पर सख़्त शर्तें लगाती है। धारा 50 के तहत मजिस्ट्रेट या गज़ेटेड अधिकारी के सामने तलाशी का अधिकार जैसे प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय अक्सर केस का नतीजा तय करते हैं। लॉ चैंबर्स ऑफ़ मृदुल जिंदल गाजियाबाद, नोएडा और दिल्ली में ऐसे मामले देखता है। कॉल करें: +91-8800669834

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NDPS में गिरफ़्तारी? मात्रा और प्रक्रिया ही केस तय करती है

स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) के मामले भारत के सबसे गंभीर आपराधिक मामलों में गिने जाते हैं। सज़ा काफ़ी हद तक इस पर निर्भर करती है कि बरामद पदार्थ केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अल्प मात्रा, मध्यम मात्रा या वाणिज्यिक मात्रा है। उदाहरण के लिए, गांजे में अल्प मात्रा 1 किलो तक और वाणिज्यिक मात्रा 20 किलो या अधिक है। हेरोइन में ये सीमाएँ 5 ग्राम और 250 ग्राम हैं।

क्योंकि दांव बहुत ऊँचे हैं, कानून तलाशी, ज़ब्ती, सैंपलिंग और जाँच के लिए सख़्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा भी देता है। व्यवहार में NDPS केस अक्सर इसी पर तय होते हैं कि इन सुरक्षा उपायों का पालन हुआ या नहीं।

लॉ चैम्बर्स ऑफ़ मृदुल जिंदल दिल्ली, गाजियाबाद और गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की स्पेशल NDPS अदालतों, दिल्ली हाईकोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में NDPS मामलों में आरोपियों का बचाव करता है। इनमें स्थानीय पुलिस, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) और अन्य एजेंसियों के केस शामिल हैं।

NDPS मामलों में जमानत

अल्प और मध्यम मात्रा: जमानत BNSS के सामान्य सिद्धांतों पर मिलती है। अदालत मात्रा, आरोपी की भूमिका, पिछला रिकॉर्ड और जाँच की स्थिति देखती है। सामान्य प्रक्रिया के लिए हमारा जमानत पेज देखें।

वाणिज्यिक मात्रा (धारा 37): वाणिज्यिक मात्रा और धारा 19, 24 व 27A के अपराधों में जमानत तभी मिल सकती है जब लोक अभियोजक को सुना जाए और अदालत संतुष्ट हो कि यह मानने के उचित आधार हैं कि आरोपी दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए अपराध नहीं करेगा। इन "दोहरी शर्तों" के कारण जमानत कठिन होती है, इसलिए आवेदन में रिकॉर्ड का विस्तार से जवाब देना ज़रूरी है।

लंबी हिरासत और देरी: सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद मुस्लिम बनाम राज्य (दिल्ली) (2023) समेत कई फ़ैसलों में माना है कि लंबी क़ैद और ट्रायल में देरी धारा 37 वाले मामलों में भी जमानत के लिए प्रासंगिक है।

डिफ़ॉल्ट जमानत: वाणिज्यिक मात्रा और धारा 19, 24 व 27A के अपराधों में जाँच की अवधि 90 की जगह 180 दिन है (धारा 36A(4)), जिसे लोक अभियोजक की रिपोर्ट पर ही एक साल तक बढ़ाया जा सकता है। समय पर चार्जशीट दाख़िल न होने पर आरोपी को डिफ़ॉल्ट जमानत का अधिकार मिलता है, जिसे तुरंत माँगना होता है।

आम बचाव: तलाशी, ज़ब्ती और सैंपलिंग

धारा 50 (व्यक्तिगत तलाशी): व्यक्तिगत तलाशी से पहले आरोपी को बताना ज़रूरी है कि उसे राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में तलाशी का अधिकार है। संविधान पीठ ने विजयसिंह चंदूभा जडेजा बनाम गुजरात राज्य (2011) में इसे अनिवार्य माना। इसका पालन न होने पर व्यक्ति से हुई बरामदगी प्रभावित हो सकती है।

धारा 42 और 43: पूर्व सूचना के आधार पर इमारत या वाहन की तलाशी की अपनी शर्तें हैं, जिनमें सूचना को लिखित रूप में दर्ज करना और वरिष्ठ अधिकारी को भेजना शामिल है।

धारा 52A (सैंपलिंग और इन्वेंटरी): ज़ब्त ड्रग्स की इन्वेंटरी और सैंपल मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में लिए जाने चाहिए। कस्टडी की कड़ी में कमी, सैंपल भेजने में देरी, या ज़ब्त और जाँची गई मात्रा में अंतर, ये ट्रायल में आम मुद्दे हैं।

अधिकारियों के सामने बयान: तोफ़ान सिंह बनाम तमिलनाडु राज्य (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि NDPS अधिकारी "पुलिस अधिकारी" हैं, इसलिए धारा 67 के तहत दर्ज इक़बालिया बयान स्वीकारोक्ति के रूप में मान्य नहीं हैं।

ट्रायल, सेवन के मामले और ज़रूरी दस्तावेज़

NDPS अपराधों का ट्रायल धारा 36 के तहत बनी स्पेशल अदालतों में होता है। हम पूरा बचाव संभालते हैं: जमानत और डिस्चार्ज से लेकर ज़ब्ती के गवाहों और केमिकल एग्ज़ामिनर से जिरह और अंतिम बहस तक। हाईकोर्ट में अपील और सज़ा निलंबन, और सुप्रीम कोर्ट में SLP भी हम देखते हैं।

निजी सेवन या अल्प मात्रा के मामलों में कानून आरोपी के साथ बहुत अलग व्यवहार करता है, और धारा 64A नशा-मुक्ति इलाज के लिए स्वेच्छा से आगे आने वाले व्यक्ति को शर्तों के साथ छूट देती है। इन विकल्पों पर भी हम परिवारों को सलाह देते हैं।

ये दस्तावेज़ साथ लाएँ: FIR या NCB की शिकायत, गिरफ़्तारी और ज़ब्ती मेमो (अगर दिया गया हो), अब तक के रिमांड और जमानत आदेश, गिरफ़्तारी की तारीख़ (डिफ़ॉल्ट जमानत के लिए ज़रूरी), और किसी पुराने केस का विवरण।

परामर्श पहले से अपॉइंटमेंट लेकर इंदिरापुरम चैम्बर में या ऑनलाइन होता है। जितनी जल्दी हो सके हमसे संपर्क करें। हर केस अपने तथ्यों पर निर्भर करता है। यह पेज केवल सामान्य जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं।

NDPS केस से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हाँ, लेकिन कठिन है। धारा 37 के तहत लोक अभियोजक को सुनने के बाद अदालत को संतुष्ट होना होता है कि यह मानने के उचित आधार हैं कि आरोपी दोषी नहीं है और जमानत पर अपराध नहीं करेगा। लंबी हिरासत और ट्रायल में देरी भी प्रासंगिक है।

वाणिज्यिक मात्रा और धारा 19, 24 व 27A के अपराधों में पुलिस को चार्जशीट के लिए 180 दिन मिलते हैं, जिसे लोक अभियोजक की रिपोर्ट पर ही एक साल तक बढ़ाया जा सकता है। समय पर चार्जशीट न आने पर आरोपी डिफ़ॉल्ट जमानत माँग सकता है।

व्यक्तिगत तलाशी से पहले आरोपी को बताना होता है कि उसे राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट के सामने तलाशी का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अनिवार्य माना है, और पालन न होने पर व्यक्ति से हुई बरामदगी संदिग्ध हो सकती है।

NDPS अपराधों का ट्रायल NDPS अधिनियम की धारा 36 के तहत बनी स्पेशल अदालतें करती हैं, जिनकी अध्यक्षता आम तौर पर सेशन जज करते हैं। अपील हाईकोर्ट में होती है।

परिवार का कोई सदस्य NDPS केस में गिरफ़्तार है?

NDPS मामलों में मात्रा, समय-सीमा और तलाशी की प्रक्रिया बहुत मायने रखती है। जमानत और बचाव के बारे में अधिवक्ता मृदुल जिंदल से बात करें।