संक्षिप्त उत्तर: दिल्ली में 498A केस
पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता, जो पहले IPC की धारा 498A थी, अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 है (परिभाषा धारा 86 में), और इसमें तीन साल तक की सज़ा और जुर्माना है। दिल्ली में कई शिकायतें FIR से पहले ज़िला पुलिस के क्राइम अगेंस्ट वीमेन (CAW) सेल में काउंसलिंग और मध्यस्थता के लिए जाती हैं। सज़ा तीन साल तक होने से पुलिस को आमतौर पर गिरफ्तारी के बजाय BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस देना चाहिए (Arnesh Kumar v. State of Bihar, 2014)। पक्षों में सच्चा समझौता होने पर दिल्ली हाईकोर्ट 498A की FIR रद्द कर सकता है। Law Chambers of Mridul Jindal दिल्ली में ये मामले देखता है। कॉल करें: +91-8800669834।
लेखन और समीक्षा: एडवोकेट मृदुल जिंदल, बार काउंसिल ऑफ दिल्ली में पंजीकृत (2021) · अंतिम अपडेट 01.11.2026
दिल्ली में 498A शिकायत कैसे आगे बढ़ती है
- CAW सेल: शिकायत अक्सर ज़िले के CAW सेल में भेजी जाती है, जहाँ दोनों पक्षों को काउंसलिंग और समझौते की बातचीत के लिए बुलाया जाता है।
- FIR: समझौता न होने पर BNS की धारा 85 और 86 और दहेज निषेध अधिनियम के तहत FIR दर्ज हो सकती है।
- जाँच और चार्जशीट: बयान दर्ज होते हैं और ज़िला कोर्ट परिसर में मजिस्ट्रेट के सामने चार्जशीट दाखिल होती है।
- जुड़े केस: भरण-पोषण, घरेलू हिंसा, तलाक और कस्टडी के केस अक्सर फैमिली कोर्ट में साथ चलते हैं।
पति और परिवार के लिए
हम सेशन कोर्ट या दिल्ली हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत दायर करते हैं, CAW सेल की कार्यवाही की तैयारी करते हैं, और दूर के रिश्तेदारों पर लगाए गए अस्पष्ट आरोपों को चुनौती देते हैं; सुप्रीम कोर्ट ने Kahkashan Kausar v. State of Bihar (2022) में बिना विशिष्ट आरोप के रिश्तेदारों को फँसाने के खिलाफ चेताया है। 2025 में सुप्रीम कोर्ट (Shivangi Bansal v. Sahil Bansal) ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उन दिशानिर्देशों को लागू करने का निर्देश दिया जिनमें दो महीने की कूलिंग अवधि और दबावपूर्ण कार्रवाई से पहले परिवार कल्याण समिति को मामला भेजने की व्यवस्था है।
पत्नी और उसके परिवार के लिए
हम तारीखों और विशिष्ट घटनाओं के साथ स्पष्ट शिकायत तैयार करने में मदद करते हैं, CAW सेल की प्रक्रिया में साथ देते हैं, और आपराधिक केस के साथ घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत भरण-पोषण, निवास और सुरक्षा आदेश तथा स्त्रीधन की वापसी के लिए कार्रवाई करते हैं।
समझौता और FIR रद्द करना
यदि पक्ष समझौता कर लेते हैं, जैसे आपसी सहमति से तलाक के साथ, तो दिल्ली हाईकोर्ट संयुक्त याचिका पर BNSS की धारा 528 के तहत FIR रद्द कर सकता है, जैसा B.S. Joshi v. State of Haryana (2003) और Gian Singh v. State of Punjab (2012) में माना गया। समझौते की शर्तें ध्यान से लिखी जानी चाहिए ताकि सभी जुड़े केस एक साथ खत्म हों।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
विवाहित महिला के साथ क्रूरता, जो पहले IPC की धारा 498A थी, अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 है, और क्रूरता की परिभाषा धारा 86 में है।
दिल्ली पुलिस की ज़िला इकाई का क्राइम अगेंस्ट वीमेन सेल, जो वैवाहिक शिकायतों को अक्सर FIR से पहले काउंसलिंग और मध्यस्थता के ज़रिए देखता है।
अपराध की सज़ा तीन साल तक होने से पुलिस को आमतौर पर BNSS की धारा 35(3) के तहत हाज़िरी का नोटिस देना चाहिए और कानूनी शर्तें पूरी होने पर ही गिरफ्तार करना चाहिए, Arnesh Kumar v. State of Bihar (2014) के अनुसार।
हाँ। पक्षों के बीच सच्चे समझौते पर दिल्ली हाईकोर्ट BNSS की धारा 528 के तहत FIR रद्द कर सकता है, आमतौर पर हलफ़नामों के साथ संयुक्त याचिका पर।
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