संक्षिप्त उत्तर: दिल्ली में तलाक
दिल्ली में तलाक के केस हर ज़िला कोर्ट परिसर की फैमिली कोर्ट में सुने जाते हैं। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19 के तहत याचिका वहाँ दायर हो सकती है जहाँ शादी हुई, जहाँ प्रतिवादी रहता है, जहाँ पति-पत्नी आखिरी बार साथ रहे, या जहाँ पत्नी रहती है यदि याचिका वह दायर कर रही है। धारा 13B के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए कम से कम एक साल अलग रहना ज़रूरी है, और छह महीने की प्रतीक्षा अवधि माफ़ की जा सकती है (Amardeep Singh v. Harveen Kaur, 2017)। विवादित तलाक धारा 13 के आधारों जैसे क्रूरता या परित्याग पर चलता है। Law Chambers of Mridul Jindal दिल्ली में ये मामले देखता है। कॉल करें: +91-8800669834।
लेखन और समीक्षा: एडवोकेट मृदुल जिंदल, बार काउंसिल ऑफ दिल्ली में पंजीकृत (2021) · अंतिम अपडेट 01.11.2026
दिल्ली की कौन सी फैमिली कोर्ट?
दिल्ली के हर ज़िला कोर्ट परिसर में उसके ज़िलों के लिए फैमिली कोर्ट हैं, जैसे ईस्ट, नॉर्थ-ईस्ट और शाहदरा के लिए कड़कड़डूमा, साउथ और साउथ-ईस्ट के लिए साकेत, और सेंट्रल व वेस्ट के लिए तीस हज़ारी। सभी परिसरों की सूची दिल्ली कोर्ट गाइड में है।
दिल्ली में आपसी सहमति से तलाक
- समझौता: एलिमनी, सामान की वापसी, कस्टडी और दूसरे केस वापस लेने पर सहमति, आमतौर पर समझौता पत्र या मध्यस्थता के ज़रिए।
- पहला मोशन: समझौते की शर्तों के साथ धारा 13B के तहत संयुक्त याचिका।
- दूसरा मोशन: बयान फिर से दर्ज होते हैं; Amardeep Singh की शर्तें पूरी होने पर अदालत छह महीने की अवधि माफ़ कर सकती है।
विवादित तलाक, भरण-पोषण और कस्टडी
विवादित केस में अक्सर जुड़ी कार्यवाहियाँ होती हैं: BNSS की धारा 144 और हिंदू विवाह अधिनियम के तहत भरण-पोषण, घरेलू हिंसा के आवेदन, और संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम के तहत कस्टडी। Rajnesh v. Neha (2020) के अनुसार दोनों पक्षों को संपत्ति और देनदारियों का हलफ़नामा देना होता है। दिल्ली की फैमिली कोर्ट ज़्यादातर केस मध्यस्थता में भेजती हैं, और वहाँ हुआ समझौता जल्दी आपसी सहमति के तलाक तक ले जा सकता है।
कौन से दस्तावेज़ तैयार रखें
- शादी का प्रमाण: विवाह प्रमाणपत्र, शादी की तस्वीरें या निमंत्रण पत्र।
- पता और पहचान: अधिकार क्षेत्र के लिए दोनों पति-पत्नी के पते का प्रमाण।
- आय और संपत्ति: भरण-पोषण हलफ़नामे के लिए सैलरी स्लिप, ITR और बैंक स्टेटमेंट।
- बच्चे: कस्टडी के लिए जन्म प्रमाणपत्र और स्कूल रिकॉर्ड।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कम से कम एक साल अलग रहने के बाद याचिका दायर हो सकती है। दूसरा मोशन आमतौर पर पहले के छह महीने बाद होता है, लेकिन उचित मामलों में अदालत यह अवधि माफ़ कर सकती है, जिससे सहमति वाला केस कुछ हफ्तों में भी पूरा हो सकता है।
हाँ, यदि प्रतिवादी दिल्ली में रहता है, पति-पत्नी आखिरी बार दिल्ली में साथ रहे, या पत्नी दिल्ली में रहती है और याचिका वह दायर कर रही है, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19 के तहत।
फैमिली कोर्ट केस और अपने निर्देशों के अनुसार विदेश में रहने वाले पक्ष को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से या कुछ चरणों में पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के ज़रिए पेश होने की अनुमति दे सकती है।
फैमिली कोर्ट नियमित रूप से वैवाहिक विवादों को मध्यस्थता केंद्रों में भेजती हैं। हर चरण के लिए यह पूर्व शर्त नहीं है, लेकिन ज़्यादातर अदालतें चाहती हैं कि पक्ष इसका प्रयास करें।
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