संक्षिप्त उत्तर: मानहानि
भारत में मानहानि अपराध भी है और सिविल ग़लती भी। किसी झूठे बयान से, चाहे वह सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो, रिव्यू या WhatsApp मैसेज हो, जिसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा हो, वह भारतीय न्याय संहिता की धारा 356 के तहत आपराधिक शिकायत (दो साल तक साधारण कारावास, जुर्माना, दोनों या सामुदायिक सेवा) और हर्जाने व निषेधाज्ञा के लिए सिविल मुक़दमा कर सकता है। सिविल मुक़दमा आम तौर पर एक साल के भीतर करना होता है। प्लेटफ़ॉर्म से कंटेंट हटवाया जा सकता है और अदालत भी हटाने का आदेश दे सकती है। कॉल करें: +91-8800669834।
लेखन व समीक्षा: एडवोकेट मृदुल जिंदल, बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली में नामांकित (2021) · अंतिम अपडेट 1 Nov 2026
मुख्य तथ्य
- आपराधिक मानहानि: धारा 356 BNS (पहले धारा 499–500 IPC)
- सज़ा: 2 साल तक साधारण कारावास, जुर्माना, दोनों या सामुदायिक सेवा
- शिकायत: पीड़ित व्यक्ति मजिस्ट्रेट के समक्ष (धारा 222 BNSS)
- सिविल मुक़दमा: हर्जाना और निषेधाज्ञा; समय-सीमा 1 साल
- ऑनलाइन कंटेंट: IT नियम, 2021 के तहत प्लेटफ़ॉर्म शिकायत और अदालत से हटाने का आदेश
मानहानि क्या है?
किसी व्यक्ति के बारे में शब्दों, संकेतों या दृश्य माध्यम से ऐसा बयान देना या प्रकाशित करना जिससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने का इरादा हो या नुकसान होने की संभावना हो। पोस्ट, रील, रिव्यू, ग्रुप मैसेज और कमेंट भी प्रकाशन हैं।
क़ानून कुछ अपवाद मानता है, जैसे जनहित में सच्चा बयान, सार्वजनिक आचरण पर उचित टिप्पणी, अदालती कार्यवाही की सही रिपोर्ट, और किसी अधिकृत अधिकारी के पास सद्भावना से की गई शिकायत।
आपराधिक शिकायत या सिविल मुक़दमा?
आपराधिक शिकायत (धारा 356 BNS): पीड़ित व्यक्ति मजिस्ट्रेट के पास दाख़िल करता है; अक्सर माफ़ी के साथ समझौता हो जाता है। सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ (2016) में आपराधिक मानहानि को संवैधानिक माना गया।
सिविल मुक़दमा: प्रतिष्ठा के नुकसान का हर्जाना और प्रकाशन रोकने या हटाने की निषेधाज्ञा; आम तौर पर प्रकाशन के एक साल के भीतर।
दोनों साथ-साथ किए जा सकते हैं। अगर आपको मानहानि का नोटिस मिला है, तो यही अपवाद और बचाव जवाब देने में मदद करते हैं।
यह पेज केवल सामान्य जानकारी देता है; यह कानूनी सलाह, विज्ञापन या काम का आग्रह नहीं है। अस्वीकरण देखें।
सबसे अच्छा मानहानि वकील कैसे चुनें?
सबसे अच्छा वकील वही है जो आपके मामले के लिए उपयुक्त हो। देखें कि वकील किसी राज्य बार काउंसिल में नामांकित है (एडवोकेट मृदुल जिंदल: बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली, D/3547/2021), दिल्ली और गाजियाबाद में मानहानि शिकायतों, मुक़दमों और कंटेंट हटवाने के मामलों में नियमित रूप से काम करता है, बिना नतीजे की गारंटी दिए क़दम, समय और खर्च साफ़ समझाता है, और तारीख़ों की जानकारी देता रहता है।
आधिकारिक स्रोत: भारतीय न्याय संहिता, 2023 · सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 · MeitY (IT नियम, 2021)
मानहानि हुई है या आरोप लगा है?
नोटिस, कंटेंट हटवाने, आपराधिक शिकायत, सिविल मुक़दमे या बचाव पर सलाह लें।
संबंधित: झूठी FIR · साइबर क्राइम
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
धारा 356 BNS के तहत दो साल तक साधारण कारावास, या जुर्माना, या दोनों, या सामुदायिक सेवा।
हाँ। पोस्ट, वीडियो, रिव्यू या मैसेज प्रकाशन है; आपराधिक शिकायत, हर्जाने का मुक़दमा और हटाने का आदेश माँगा जा सकता है।
सिविल मुक़दमा आम तौर पर प्रकाशन के एक साल के भीतर करना होता है।
IT नियम, 2021 के तहत प्लेटफ़ॉर्म के शिकायत अधिकारी को रिपोर्ट करें, क़ानूनी नोटिस भेजें और ज़रूरत हो तो अदालत से निषेधाज्ञा लें।
ऑनलाइन या ऑफ़लाइन मानहानि?
सबूत सँभालें और समय-सीमा के भीतर कार्रवाई करें।
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सोशल मीडिया पर मानहानि
सबूत सँभालें: URL, तारीख़ और अकाउंट नाम के साथ स्क्रीनशॉट लें और लिंक सेव करें।
प्लेटफ़ॉर्म को रिपोर्ट करें: IT नियम, 2021 के तहत हर प्लेटफ़ॉर्म का शिकायत अधिकारी होता है।
क़ानूनी नोटिस: पोस्ट हटाने, माफ़ी और खंडन की माँग वाला नोटिस अक्सर मामला सुलझा देता है।
अदालत का आदेश: अदालत कंटेंट हटाने और आगे प्रकाशन रोकने की अंतरिम निषेधाज्ञा दे सकती है।
धमकी या उत्पीड़न: देखें साइबर क्राइम वकील।