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संक्षिप्त उत्तर: झूठी FIR

अगर आपके ख़िलाफ़ झूठी FIR दर्ज हुई है, तो पहले अग्रिम ज़मानत से अपनी स्वतंत्रता सुरक्षित करें, और जहाँ FIR से कोई अपराध न बनता हो या वह साफ़ तौर पर दुर्भावनापूर्ण हो, वहाँ धारा 528 BNSS के तहत हाई कोर्ट से उसे रद्द कराने की माँग करें। बरी होने के बाद झूठा आरोप लगाने वाले के ख़िलाफ़ भी उपाय हैं: झूठी सूचना (धारा 217 BNS) या झूठा आरोप (धारा 248 BNS) की शिकायत, धारा 273 BNSS के तहत मुआवज़ा, और दुर्भावनापूर्ण अभियोजन का सिविल मुक़दमा, जो बरी होने के एक साल के भीतर करना होता है। कॉल करें: +91-8800669834।

लेखन व समीक्षा: एडवोकेट मृदुल जिंदल, बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली में नामांकित (2021) · अंतिम अपडेट 1 Nov 2026

मुख्य तथ्य

  • झूठी FIR रद्द कराना: धारा 528 BNSS, हाई कोर्ट
  • गिरफ़्तारी से बचाव: धारा 482 BNSS के तहत अग्रिम ज़मानत
  • पुलिस को झूठी सूचना: धारा 217 BNS (पहले 182 IPC)
  • झूठा आपराधिक आरोप: धारा 248 BNS (पहले 211 IPC)
  • बिना उचित कारण आरोप पर मुआवज़ा: धारा 273 BNSS
  • दुर्भावनापूर्ण अभियोजन का मुक़दमा: बरी होने के 1 साल के भीतर (अनुच्छेद 74, परिसीमा अधिनियम)

झूठी FIR में नाम आए तो पहले क्या करें

1. FIR की कॉपी लें और देखें कि क्या आरोप और कौन-सी धाराएँ हैं।

2. स्वतंत्रता सुरक्षित करें: 7 साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस को आम तौर पर गिरफ़्तारी के बजाय धारा 35 BNSS के तहत पेश होने का नोटिस देना होता है। गिरफ़्तारी का ख़तरा हो तो धारा 482 BNSS के तहत अग्रिम ज़मानत लें।

3. सबूत सँभालें: मैसेज, कॉल रिकॉर्ड, CCTV, लोकेशन, दस्तावेज़ और गवाह जो आरोपों को झूठा साबित करें।

4. अपना पक्ष लिखित में दस्तावेज़ों के साथ जाँच अधिकारी को दें।

5. शिकायतकर्ता से संपर्क या धमकी न दें।

हाई कोर्ट में झूठी FIR रद्द कराना

हाई कोर्ट क़ानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए धारा 528 BNSS (पहले धारा 482 CrPC) के तहत FIR या कार्यवाही रद्द कर सकता है। हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (1992) में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी स्थितियाँ बताईं, जैसे जब आरोप मान लेने पर भी कोई अपराध न बनता हो, या कार्यवाही साफ़ तौर पर दुर्भावना से शुरू की गई हो।

दिल्ली की FIR के लिए दिल्ली हाई कोर्ट और गाजियाबाद व उत्तर प्रदेश की FIR के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाख़िल होती है।

झूठा केस करने वाले के ख़िलाफ़ उपाय

झूठी सूचना या झूठे आरोप की शिकायत: नुकसान पहुँचाने के लिए पुलिस को झूठी सूचना देना (धारा 217 BNS) और बिना उचित आधार जानते हुए झूठा आपराधिक आरोप लगाना (धारा 248 BNS) अपराध हैं। अदालती कार्यवाही में झूठे आरोप के लिए शिकायत आम तौर पर उसी अदालत के ज़रिए धारा 215 और 379 BNSS के तहत होती है।

उसी केस में मुआवज़ा: शिकायत या सूचना पर शुरू हुए केस में आरोपी के डिस्चार्ज या बरी होने पर, अगर आरोप बिना उचित कारण लगाया गया हो, तो मजिस्ट्रेट धारा 273 BNSS के तहत शिकायतकर्ता को मुआवज़ा देने का आदेश दे सकता है।

दुर्भावनापूर्ण अभियोजन का सिविल मुक़दमा: प्रतिष्ठा की हानि, मानसिक पीड़ा, क़ानूनी खर्च और आय के नुकसान के लिए हर्जाना। दिखाना होता है कि प्रतिवादी ने अभियोजन शुरू कराया, वह आपके पक्ष में ख़त्म हुआ, उचित कारण नहीं था, दुर्भावना थी और आपको नुकसान हुआ। यह मुक़दमा बरी होने के एक साल के भीतर करना होता है।

मानहानि: दूसरों के सामने फैलाए गए झूठे आरोप मानहानि भी हो सकते हैं। देखें मानहानि वकील।

सबसे अच्छा वकील झूठी FIR के मामले में कैसे चुनें?

सबसे अच्छा वकील वही है जो आपके मामले के लिए उपयुक्त हो। देखें कि वकील किसी राज्य बार काउंसिल में नामांकित है (एडवोकेट मृदुल जिंदल: बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली, D/3547/2021), दिल्ली और गाजियाबाद की अदालतों तथा हाई कोर्ट में ज़मानत, FIR रद्द कराने और दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के मामलों में नियमित रूप से काम करता है, बिना नतीजे की गारंटी दिए क़दम, समय और खर्च साफ़ समझाता है, और तारीख़ों की जानकारी देता रहता है।

पहली मुलाक़ात में क्या लाएँ

FIR या शिकायत, पुलिस नोटिस, बेगुनाही के सबूत और शिकायतकर्ता से संबंधों की छोटी समय-रेखा।

यह पेज केवल सामान्य जानकारी देता है; यह कानूनी सलाह, विज्ञापन या काम का आग्रह नहीं है। अस्वीकरण देखें।

झूठे केस का सामना कर रहे हैं?

शुरुआती क़दम तय करते हैं कि गिरफ़्तारी से बच पाएँगे या नहीं और झूठा केस कितनी जल्दी ख़त्म होगा।

संबंधित: दिल्ली में क्रिमिनल वकील · गाजियाबाद में क्रिमिनल वकील

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नुकसान पहुँचाने के लिए पुलिस को झूठी सूचना देना धारा 217 BNS और जानते हुए झूठा आपराधिक आरोप लगाना धारा 248 BNS के तहत अपराध है।

धारा 528 BNSS के तहत हाई कोर्ट में याचिका दाख़िल कर, यह दिखाकर कि FIR से अपराध नहीं बनता, आरोप असंभव हैं या दुर्भावनापूर्ण हैं।

हाँ। मजिस्ट्रेट धारा 273 BNSS के तहत मुआवज़ा दिला सकता है, और दुर्भावनापूर्ण अभियोजन का सिविल मुक़दमा भी किया जा सकता है।

परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 74 के अनुसार बरी होने या अभियोजन ख़त्म होने से एक साल।

झूठी FIR में नाम आया?

पहले अपनी स्वतंत्रता सुरक्षित करें, फिर शिकायतकर्ता को जवाबदेह बनाएँ।