संक्षिप्त उत्तर: दिल्ली में जमानत
दिल्ली में अग्रिम जमानत (BNSS की धारा 482, पहले CrPC की धारा 438) आमतौर पर पहले उस जिले के सेशन कोर्ट में दायर की जाती है जहाँ FIR दर्ज है, जैसे पूर्वी दिल्ली के लिए कड़कड़डूमा या दक्षिणी दिल्ली के लिए साकेत, और ज़रूरत हो तो फिर दिल्ली हाईकोर्ट में। गिरफ्तारी के बाद नियमित जमानत मजिस्ट्रेट के यहाँ धारा 480 या सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट में धारा 483 के तहत माँगी जाती है। यदि 60 या 90 दिन में चार्जशीट दाखिल नहीं होती तो धारा 187(3) के तहत डिफ़ॉल्ट जमानत का अधिकार मिलता है। Law Chambers of Mridul Jindal दिल्ली में ये मामले देखता है। कॉल करें: +91-8800669834।
लेखन और समीक्षा: एडवोकेट मृदुल जिंदल, बार काउंसिल ऑफ दिल्ली में पंजीकृत (2021) · अंतिम अपडेट 01.11.2026
दिल्ली में जमानत का आवेदन कहाँ करें?
अदालत उस थाने से तय होती है जिसने FIR दर्ज की। दिल्ली के ग्यारह न्यायिक जिले सात कोर्ट परिसरों में हैं: तीस हज़ारी (सेंट्रल, वेस्ट), पटियाला हाउस (नई दिल्ली), कड़कड़डूमा (ईस्ट, नॉर्थ-ईस्ट, शाहदरा), रोहिणी (नॉर्थ-वेस्ट, नॉर्थ), द्वारका (साउथ-वेस्ट), साकेत (साउथ, साउथ-ईस्ट) और राउज़ एवेन्यू (विशेष अदालतें, जिनमें कई CBI और ED केस)। सही परिसर जानने के लिए हमारी दिल्ली कोर्ट गाइड देखें।
अग्रिम, नियमित और डिफ़ॉल्ट जमानत
- अग्रिम जमानत: शिकायत, FIR या समन मिलने पर, सुनवाई तक गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा के साथ।
- नियमित जमानत: गिरफ्तारी के बाद, अपराध के अनुसार मजिस्ट्रेट, सेशन कोर्ट या दिल्ली हाईकोर्ट में।
- डिफ़ॉल्ट जमानत: जब चार्जशीट 60 या 90 दिन से ज़्यादा देर से आए, BNSS की धारा 187(3) के तहत।
- विचाराधीन कैदी की रिहाई: BNSS की धारा 479 के तहत अधिकतम सज़ा का आधा (पहली बार के अपराधी के लिए एक-तिहाई) काटने पर।
गिरफ्तारी से जुड़े सुरक्षा उपाय
सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस को आमतौर पर गिरफ्तारी के बजाय BNSS की धारा 35(3) के तहत हाज़िरी का नोटिस देना चाहिए, जैसा Arnesh Kumar v. State of Bihar (2014) और Satender Kumar Antil v. CBI (2022) में निर्देश दिया गया। दिल्ली पुलिस ज़्यादातर FIR अपनी वेबसाइट पर डालती है, इसलिए जमानत आवेदन के लिए कॉपी जल्दी मिल जाती है। वैवाहिक विवादों की शिकायतें अक्सर पहले क्राइम अगेंस्ट वीमेन (CAW) सेल में काउंसलिंग के लिए जाती हैं।
जमानत आवेदन के लिए दस्तावेज़
- FIR या शिकायत: FIR, नोटिस या समन की कॉपी।
- पहचान और पता: आरोपी और जमानतदार का पहचान पत्र और पते का प्रमाण।
- पृष्ठभूमि: पुराने केस, यदि कोई हों, और आपके पक्ष के दस्तावेज़ जैसे एग्रीमेंट, चैट या मेडिकल रिकॉर्ड।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आमतौर पर उस जिले के सेशन कोर्ट में जहाँ FIR दर्ज है। वहाँ से खारिज होने पर दिल्ली हाईकोर्ट में नया आवेदन किया जा सकता है। उचित मामलों में सीधे हाईकोर्ट भी जाया जा सकता है।
दिल्ली में दर्ज ज़्यादातर FIR संवेदनशील मामलों को छोड़कर 24 घंटे में दिल्ली पुलिस की वेबसाइट पर डाल दी जाती हैं। कॉपी थाने से या अदालत के ज़रिए भी मिल सकती है।
आमतौर पर पुलिस को पहले BNSS की धारा 35(3) के तहत हाज़िरी का नोटिस देना चाहिए और कानूनी शर्तें पूरी होने पर ही गिरफ्तार करना चाहिए, Arnesh Kumar v. State of Bihar (2014) के अनुसार।
यदि पुलिस 60 दिन (या मृत्युदंड, आजीवन कारावास या कम से कम दस साल की सज़ा वाले अपराधों में 90 दिन) में चार्जशीट दाखिल नहीं करती, तो आरोपी BNSS की धारा 187(3) के तहत डिफ़ॉल्ट जमानत माँग सकता है।
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