संक्षिप्त उत्तर: पैरोल, फर्लो और अंतरिम जमानत
पैरोल, फर्लो और अंतरिम जमानत तीन अलग चीज़ें हैं। पैरोल और फर्लो सज़ायाफ़्ता कैदियों की अस्थायी रिहाई हैं, जिनके लिए जेल प्रशासन के माध्यम से आवेदन होता है। फर्लो लंबी सज़ा वालों के लिए इनाम है (दिल्ली में पाँच साल या अधिक की सज़ा, जिसमें तीन साल काट चुके हों)। अंतरिम जमानत अदालत का आदेश है, जो ट्रायल या अपील लंबित रहते माँगी जाती है। अर्जी खारिज हो या समय पर तय न हो, तो दिल्ली हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की जा सकती है। कॉल करें +91-8800669834.
लेखन व समीक्षा: एडवोकेट मृदुल जिंदल, बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली में नामांकित (2021) · अंतिम अपडेट 1 Nov 2026
मुख्य बातें
- फर्लो (दिल्ली): पाँच साल या अधिक के सश्रम कारावास वाले, तीन साल काट चुके कैदी को इनाम में मिली छुट्टी (दिल्ली कारागार अधिनियम, 2000, धारा 2(1)(h))।
- सालाना सीमा: एक दोषसिद्धि-वर्ष में अधिकतम सात हफ़्ते, जैसा दिल्ली हाई कोर्ट ने 5 जनवरी 2026 के फ़ैसले में दर्ज किया (नियम 1221, दिल्ली कारागार नियम, 2018)।
- निर्णय की अवधि: फर्लो की अर्जी पर चार हफ़्ते, उसी फ़ैसले के अनुसार (नियम 1229)।
- शर्त तोड़ना: रिहाई रद्द हो सकती है और कैदी को बिना वारंट गिरफ़्तार किया जा सकता है (धारा 54, दिल्ली कारागार अधिनियम, 2000)।
- उत्तर प्रदेश: पैरोल सज़ा का निलंबन है (नियमावली, 2007), सामान्यतः एक महीने तक; यूपी जेल मैनुअल में फर्लो नहीं है।
- उपाय: दिल्ली हाई कोर्ट या इलाहाबाद हाई कोर्ट में आपराधिक रिट याचिका।
पैरोल, फर्लो और अंतरिम जमानत में फर्क
| पैरोल | फर्लो | अंतरिम जमानत | |
|---|---|---|---|
| किसे | सज़ायाफ़्ता कैदी | लंबी सज़ा वाला कैदी | आरोपी या अपीलकर्ता |
| क्यों | खास कारण, जैसे परिवार में आपात स्थिति | अच्छे आचरण का इनाम | ज़रूरी निजी या चिकित्सकीय कारण |
| क्या सज़ा में गिना जाता है? | आम तौर पर नहीं | हाँ | लागू नहीं |
| कौन तय करता है | जेल और कारागार प्राधिकारी | जेल और कारागार प्राधिकारी | अदालत |
दिल्ली में आवेदन कैसे करें
- पहले पात्रता जाँचें (सज़ा, काटे गए वर्ष, आचरण रिकॉर्ड)।
- जेल अधीक्षक के माध्यम से आवेदन दें, कारण के प्रमाण (मेडिकल कागज़, शादी का कार्ड, मृत्यु प्रमाणपत्र आदि) के साथ।
- आवेदन की तारीख नोट रखें, क्योंकि नियमों में फ़ैसले की समय-सीमा है।
- बिना उचित कारण खारिज या समय पर तय न होने पर दिल्ली हाई कोर्ट में रिट याचिका पर विचार करें।
उत्तर प्रदेश (गाज़ियाबाद, दासना जेल): सज़ा का निलंबन
उत्तर प्रदेश में पैरोल उत्तर प्रदेश (कैदियों की सज़ा का निलंबन) नियमावली, 2007 के तहत सज़ा के निलंबन के रूप में मिलता है, जिसका उल्लेख यूपी जेल मैनुअल 2022 (पैरा 250 और परिशिष्ट 16) में है। यूपी जेल मैनुअल में फर्लो का प्रावधान नहीं है।
- आधार: माता-पिता, पति/पत्नी, बेटे-बेटी या भाई-बहन की बीमारी; ऐसे रिश्तेदार की मृत्यु; बेटे, बेटी, भाई या बहन की शादी; अपनी ज़मीन पर बुवाई या कटाई (यदि कोई और व्यवस्था न हो); घर की ज़रूरी मरम्मत (यदि कोई और व्यवस्था न हो) (नियम 3)। कैदी की अपनी बीमारी सूची में नहीं है।
- अवधि: एक महीने तक, विशेष परिस्थिति में एक महीना और बढ़ाया जा सकता है (नियम 3)। निकट परिवार में मृत्यु या विवाह पर ज़िला मजिस्ट्रेट 72 घंटे तक के लिए सज़ा निलंबित कर सकते हैं (2012 का संशोधन)। दो महीने से ऊपर राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति चाहिए, और कुल अवधि सामान्यतः बारह महीने से अधिक नहीं होनी चाहिए (नियम 4)।
- आवेदन कौन करे: कैदी स्वयं, या परिवार का सदस्य या निकट संबंधी, फॉर्म-I में जेल अधीक्षक के माध्यम से। ज़िला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक 30 दिन में रिपोर्ट देते हैं और निर्णय राज्य सरकार करती है (नियम 5)।
- ज़मानती और बॉन्ड: ज़िला मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के अनुसार ज़मानती और निजी बॉन्ड आवश्यक है (नियम 5(4))।
- न्यूनतम काटी गई सज़ा: अधिकांश मामलों में बिना माफ़ी के एक वर्ष; हत्या में आजीवन कारावास पर तीन वर्ष; डकैती में चार वर्ष (नियम 6(1))।
- सीमाएँ: बाहर बिताए दिन सज़ा में नहीं गिने जाते, और निलंबन सामान्यतः साल में एक बार मिलता है (असाधारण पारिवारिक कारण में दो बार) (नियम 6)।
- कौन बाहर है: जिनकी सज़ा के विरुद्ध अपील या पुनरीक्षण लंबित है, और जिन पर किसी अदालत में कोई अन्य आपराधिक मामला लंबित है (नियम 1(4))। जघन्य अपराध या आदतन अपराधी के मामले में ज़िला मजिस्ट्रेट या पुलिस अधीक्षक की राय में शांति भंग का खतरा हो तो भी रिहाई से मना किया जा सकता है (नियम 6(2))।
- देर से लौटना: देरी से आत्मसमर्पण पर अनुशासनहीनता दर्ज होती है और देरी के अनुसार अगला आवेदन महीनों या सालों तक रुक जाता है (नियम 7)।
अलग रास्ता यू.पी. प्रिज़नर्स रिलीज़ ऑन प्रोबेशन एक्ट, 1938 के तहत लाइसेंस पर रिहाई है, जो सामान्यतः एक-तिहाई सज़ा काटने के बाद विचारणीय होती है। मैनुअल में होम लीव केवल लखनऊ की मॉडल जेल के लिए है। यूपी में अर्ज़ी खारिज हो तो इलाहाबाद हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की जा सकती है।
जेल और अदालतें जहाँ हम काम करते हैं
दिल्ली की तिहाड़, मंडोली और रोहिणी जेल, दिल्ली हाई कोर्ट, और उत्तर प्रदेश के मामलों में गाज़ियाबाद के पास की जेलें (जैसे दासना) और इलाहाबाद हाई कोर्ट। चैंबर: निति खंड-2, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद। यह भी देखें: दिल्ली में जमानत, दिल्ली में क्रिमिनल वकील।
यह सामान्य जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। नियम बदलते हैं और हर मामला अलग होता है, इसलिए मौजूदा नियम और अपने तथ्य जाँच लें।
आधिकारिक स्रोत: दिल्ली कारागार अधिनियम, 2000 (धाराएँ 2, 47, 54, 71) · दिल्ली कारागार नियम, 2018 · दिल्ली हाई कोर्ट, W.P.(Crl) 646/2025, वासुदेव बनाम राज्य एनसीटी दिल्ली (5 जनवरी 2026) · उत्तर प्रदेश जेल मैनुअल, 2022 (अध्याय 13, परिशिष्ट 16) · India Code
पैरोल या फर्लो के आवेदन में मदद चाहिए?
परिवार का कोई सदस्य दिल्ली या यूपी की जेल में है, तो पात्रता, आवेदन और अर्ज़ी खारिज या लंबित होने पर क्या करें, इस पर सलाह लें।
यह भी पढ़ें: पैरोल और फर्लो में फर्क: पात्रता और आवेदन कैसे करें
यह भी देखें: दिल्ली में जमानत · दिल्ली में क्रिमिनल वकील · गाज़ियाबाद में जमानत
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पैरोल किसी खास कारण से, जैसे परिवार में आपात स्थिति, मिलने वाली अस्थायी रिहाई है, और बाहर बिताए दिन आम तौर पर सज़ा में नहीं गिने जाते। फर्लो लंबी सज़ा काट रहे कैदी को अच्छे आचरण के इनाम के रूप में मिलने वाली छुट्टी है, और इस दौरान सज़ा चलती रहती है। अंतरिम जमानत अलग है: यह अदालत का आदेश है, जो ट्रायल या अपील लंबित रहते हुए माँगी जा सकती है।
दिल्ली कारागार अधिनियम, 2000 के अनुसार फर्लो उस सज़ायाफ़्ता कैदी को इनाम के रूप में मिली छुट्टी है जिसे पाँच साल या उससे अधिक के सश्रम कारावास की सज़ा हुई हो और जो उसमें से तीन साल काट चुका हो। दिल्ली कारागार नियम, 2018 में अच्छे आचरण जैसी अन्य शर्तें भी हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट के 5 जनवरी 2026 के फ़ैसले (वासुदेव बनाम राज्य एनसीटी दिल्ली) में कोर्ट ने दिल्ली कारागार नियम, 2018 के नियम 1221 को एक दोषसिद्धि-वर्ष में अधिकतम सात हफ़्ते (49 दिन) फर्लो की अनुमति देने वाला दर्ज किया है। आवेदन से पहले मौजूदा नियम और अपने मामले की जाँच कर लें।
इसी फ़ैसले में नियम 1229 को दर्ज किया गया है, जिसके अनुसार फर्लो की अर्जी पर चार हफ़्ते में निर्णय होना चाहिए। इस अवधि में निर्णय न हो तो दिल्ली हाई कोर्ट में रिट याचिका पर विचार किया जा सकता है।
दिल्ली कारागार अधिनियम, 2000 की धारा 54 के तहत सक्षम प्राधिकारी रिहाई रद्द कर सकता है, कैदी को बिना वारंट गिरफ़्तार करके बची हुई सज़ा काटने भेजा जा सकता है, और शर्त तोड़ने के लिए दोषी ठहराए जाने पर दो साल तक की अतिरिक्त कैद या जुर्माना हो सकता है।
हाँ। बिना कारण बताए या नियमों के विरुद्ध खारिज किए जाने पर दिल्ली हाई कोर्ट में आपराधिक रिट याचिका दायर की जा सकती है। कुछ मामलों में कोर्ट ने पहले याचिका को अभ्यावेदन मानकर तय समय में निर्णय लेने को कहा है।
हाँ। यूपी में पैरोल उत्तर प्रदेश (कैदियों की सज़ा का निलंबन) नियमावली, 2007 के तहत सज़ा का निलंबन है। यह सामान्यतः एक महीने तक, परिवार में बीमारी, मृत्यु या विवाह जैसे आधार पर मिलता है, और सज़ा के विरुद्ध अपील या कोई अन्य आपराधिक मामला लंबित हो तो नहीं मिलता। यूपी जेल मैनुअल में फर्लो का प्रावधान नहीं है।
परिवार का सदस्य जेल में है?
पैरोल, फर्लो या सज़ा के निलंबन के बारे में पूछें।
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