संक्षिप्त उत्तर: पैरोल और फर्लो दोनों सज़ायाफ़्ता कैदियों की अस्थायी रिहाई हैं, जिनके लिए जेल प्रशासन के माध्यम से आवेदन होता है। पैरोल किसी खास कारण से, जैसे परिवार में बीमारी या मृत्यु, मिलती है और बाहर बिताए दिन आम तौर पर सज़ा में नहीं गिने जाते। फर्लो लंबी सज़ा वाले कैदी को अच्छे आचरण के इनाम के रूप में मिलती है (दिल्ली में पाँच साल या अधिक के सश्रम कारावास में से तीन साल काट चुके कैदी को), और इस दौरान सज़ा चलती रहती है। अंतरिम जमानत अदालत का आदेश है। अर्जी खारिज हो या समय पर तय न हो, तो हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की जा सकती है।
परिवार का कोई सदस्य जेल में हो और घर में बीमारी, मृत्यु या शादी हो जाए, तो लोग पैरोल या फर्लो के बारे में पूछते हैं। दोनों शब्द अक्सर एक जैसे समझे जाते हैं, पर नियम, कारण और सज़ा पर असर अलग हैं।
इस लेख में
पैरोल, फर्लो और अंतरिम जमानत में फर्क
- पैरोल: किसी खास कारण से, जैसे करीबी रिश्तेदार की बीमारी, मृत्यु या शादी। बाहर बिताए दिन आम तौर पर सज़ा में नहीं गिने जाते।
- फर्लो: लंबी सज़ा वाले कैदी को अच्छे आचरण का इनाम। दिल्ली कारागार अधिनियम, 2000 (धारा 2(1)(h)) में पाँच साल या अधिक का सश्रम कारावास और तीन साल की काटी गई सज़ा। सज़ा चलती रहती है।
- अंतरिम जमानत: आरोपी या अपीलकर्ता के लिए अदालत का आदेश, ट्रायल या अपील लंबित रहते।
दिल्ली में आवेदन कैसे करें
- पात्रता जाँचें: सज़ा, काटे गए वर्ष और आचरण रिकॉर्ड।
- जेल अधीक्षक के माध्यम से आवेदन दें, कारण के प्रमाण (मेडिकल कागज़, शादी का कार्ड, मृत्यु प्रमाणपत्र) के साथ।
- आवेदन की तारीख नोट रखें। दिल्ली हाई कोर्ट ने 5 जनवरी 2026 के फ़ैसले (वासुदेव बनाम राज्य एनसीटी दिल्ली) में फर्लो की अर्जी पर चार हफ़्ते की अवधि दर्ज की है।
- खारिज होने या समय पर तय न होने पर दिल्ली हाई कोर्ट में रिट याचिका पर विचार करें।
शर्तें तोड़ना गंभीर है: दिल्ली कारागार अधिनियम, 2000 की धारा 54 के तहत रिहाई रद्द हो सकती है और कैदी को बिना वारंट गिरफ़्तार किया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश: सज़ा का निलंबन
यूपी में पैरोल उत्तर प्रदेश (कैदियों की सज़ा का निलंबन) नियमावली, 2007 के तहत सज़ा के निलंबन के रूप में मिलती है। सामान्य आधार हैं करीबी रिश्तेदार की बीमारी या मृत्यु, परिवार में शादी, अपनी ज़मीन पर बुवाई या कटाई और घर की ज़रूरी मरम्मत। अवधि सामान्यतः एक महीने तक है, एक महीना और बढ़ सकती है, और जिनकी अपील या कोई अन्य आपराधिक मामला लंबित है उन्हें आम तौर पर नहीं मिलती। पूरी जानकारी हमारे पैरोल और फर्लो वकील पेज पर है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पैरोल और फर्लो में क्या फर्क है?
पैरोल किसी खास कारण से मिलने वाली रिहाई है और बाहर बिताए दिन आम तौर पर सज़ा में नहीं गिने जाते। फर्लो लंबी सज़ा वाले कैदी को अच्छे आचरण के इनाम में मिलती है और इस दौरान सज़ा चलती रहती है।
दिल्ली में फर्लो के लिए कौन पात्र है?
दिल्ली कारागार अधिनियम, 2000 के अनुसार पाँच साल या अधिक के सश्रम कारावास की सज़ा पाया कैदी, जो उसमें से तीन साल काट चुका हो। दिल्ली कारागार नियम, 2018 में अच्छे आचरण जैसी अन्य शर्तें भी हैं।
क्या उत्तर प्रदेश में फर्लो मिलती है?
यूपी जेल मैनुअल, 2022 में फर्लो का प्रावधान नहीं है। पैरोल सज़ा के निलंबन के रूप में उत्तर प्रदेश (कैदियों की सज़ा का निलंबन) नियमावली, 2007 के तहत मिलती है, सामान्यतः एक महीने तक।
पैरोल या फर्लो की अर्जी खारिज होने पर क्या करें?
बिना कारण बताए या नियमों के विरुद्ध खारिज होने, या समय पर तय न होने पर दिल्ली हाई कोर्ट (यूपी के मामलों में इलाहाबाद हाई कोर्ट) में आपराधिक रिट याचिका दायर की जा सकती है।
पैरोल या फर्लो के आवेदन, या अर्जी खारिज होने पर रिट याचिका में मदद चाहिए? देखें दिल्ली में पैरोल और फर्लो वकील या कॉल करें +91-8800669834।
यह सामान्य कानूनी जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं। नियम बदलते हैं और हर मामला अलग होता है। — एडवोकेट मृदुल जिंदल, Law Chambers of Mridul Jindal, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद।






