- धारा 69 BNS छल से, या ऐसे शादी के वादे से, जिसे निभाने का इरादा शुरू से ही न हो, बनाए गए शारीरिक संबंध को दंडनीय बनाती है। सज़ा: दस वर्ष तक का कारावास और जुर्माना।
- असली कसौटी: क्या वादा शुरू से ही झूठा था, और क्या उसी वादे के कारण सहमति दी गई? (प्रमोद सूर्यभान पवार, 2019; दीपक गुलाटी, 2013)
- आपसी सहमति से चला रिश्ता टूट जाना, या बाद में शादी से इनकार, अपने आप में अपराध नहीं है।
- प्रदीप कुमार केसरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2 सितंबर 2025) में सर्वोच्च न्यायालय ने झूठी शिकायतों को धारा 528 BNSS के तहत रद्द करने के लिए चार-चरणीय कसौटी तय की।
एक रिश्ता टूटता है। कड़वाहट बढ़ती है। और फिर, कुछ महीनों या कभी-कभी वर्षों बाद, एक FIR दर्ज होती है, जो आपसी सहमति के रिश्ते को “आपराधिक धोखे” के रूप में पेश करती है। मेरी आपराधिक प्रैक्टिस में यह सबसे आम स्थितियों में से एक है, और यही भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 69 का मूल सवाल है। कानून उन लोगों को ज़रूर सज़ा देता है जो कभी न निभाने वाले वादों से किसी महिला को धोखा देते हैं। लेकिन कानून हर उस रिश्ते को अपराध नहीं बनाता, जो बस सफल नहीं हुआ। तो रेखा कहाँ है?
व्यवहार की हकीकत: जब ब्रेकअप FIR बन जाता है
रोज़मर्रा की प्रैक्टिस में सोच-समझकर धोखा देने वाला व्यक्ति कम ही मिलता है। ज़्यादातर मामले दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति के रिश्ते से शुरू होते हैं, जो बाद में परिवार की असहमति, मन बदलने, किसी और प्रतिबद्धता या आपसी तालमेल न बनने से टूट जाता है। फिर उसे “शादी के झूठे वादे” की शिकायत में बदल दिया जाता है, कभी दबाव बनाने, कभी समझौते के लिए, तो कभी बदले की भावना से।
यह केवल बचाव पक्ष की शिकायत नहीं है; अदालतें ख़ुद बार-बार यह कह चुकी हैं। दिल्ली की ज़िला अदालतों में बलात्कार के मुकदमों पर 2013 के एक अध्ययन में लगभग हर चार में से एक मामला “शादी के झूठे वादे” की श्रेणी में पाया गया, और ऐसे मामलों में सज़ा की दर कम रही है। कम सज़ा-दर का अर्थ यह नहीं कि हर शिकायत झूठी है, पर यह ज़रूर बताता है कि ऐसे बहुत से मुकदमे जाँच की कसौटी पर नहीं टिकते।
धारा 69 BNS वास्तव में क्या कहती है
1 जुलाई 2024 को लागू हुई भारतीय न्याय संहिता ने एक अलग अपराध बनाया, जो पुरानी भारतीय दंड संहिता (IPC) में नहीं था। धारा 69 उस व्यक्ति को दंडित करती है जो छलपूर्ण साधनों से, या बिना निभाने के इरादे के शादी का वादा करके, किसी महिला के साथ ऐसा शारीरिक संबंध बनाता है जो बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता। सज़ा दस वर्ष तक का कारावास और जुर्माना है।
धारा के स्पष्टीकरण में “छलपूर्ण साधनों” में नौकरी या पदोन्नति का झूठा वादा, और अपनी असली पहचान छिपाकर विवाह करना भी शामिल है। यानी अपराध शुरुआत में किए गए धोखे पर आधारित है, बाद की निराशा पर नहीं।
कानूनी कसौटी: क्या वादा शुरू से ही झूठा था?
यह रेखा नए कानून से पहले ही खींची जा चुकी थी, और आज भी वैसी ही है। प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2019) 9 SCC 608 में सर्वोच्च न्यायालय ने दो-स्तरीय कसौटी तय की: टूटा वादा अपराध तभी बनेगा जब वह शुरू से ही झूठा हो, यानी निभाने का कोई इरादा न हो, और उसी वादे का महिला के सहमति देने के फ़ैसले पर सीधा और तात्कालिक असर पड़ा हो। इससे पहले दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य, (2013) 7 SCC 675 में भी यही अंतर बताया गया था: सद्भाव से किया गया वादा जो बाद में पूरा न हो सके, धोखा देने के इरादे से किए गए झूठे वादे से मूल रूप से अलग है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने भी कहा है कि आपसी सहमति का रिश्ता केवल इसलिए आपराधिक नहीं बन जाता कि वह विवाह तक नहीं पहुँचा। शुरुआत का इरादा, और उसका सबूत, ही निर्णायक है।
सर्वोच्च न्यायालय का ताज़ा फ़ैसला: केसरवानी चार-चरणीय कसौटी
प्रदीप कुमार केसरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य, क्रिमिनल अपील संख्या 3831/2025 (SLP (Crl.) 11642/2019 से), में 2 सितंबर 2025 को न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने ऐसी शिकायत रद्द की, जो कथित घटनाओं के लगभग चार साल बाद दर्ज हुई थी, जिसमें ज़रूरी विवरण नहीं थे और जिसका कोई स्वतंत्र आधार नहीं था। अदालत ने कहा कि ऐसी कार्यवाही जारी रखना “कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” होगा, और बेबुनियाद आरोपों पर किसी को समन करना गंभीर बात है क्योंकि इससे प्रतिष्ठा धूमिल होती है।
अदालत ने धारा 482 CrPC (अब धारा 528 BNSS) के तहत उच्च न्यायालयों के लिए चार-चरणीय कसौटी भी तय की:
- क्या आरोपी जिस सामग्री पर भरोसा कर रहा है वह ठोस, विश्वसनीय और निर्विवाद है;
- क्या वह आरोपों को निर्णायक रूप से ख़ारिज करती है;
- क्या अभियोजन पक्ष को जवाब देने का उचित अवसर मिला है; और
- क्या कुल मिलाकर मुकदमा चलाने से सज़ा की कोई संभावना नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कसौटी वास्तविक शिकायतों को ख़ारिज करने का लाइसेंस नहीं है; इसका उद्देश्य झूठे आरोपी और सच्चे शिकायतकर्ता, दोनों की रक्षा है।
IPC के समय ऐसे मामले कैसे चलते थे
IPC में शादी के झूठे वादे पर शारीरिक संबंध के लिए कोई अलग अपराध नहीं था। ऐसे मामले आमतौर पर धारा 376 IPC (बलात्कार) को धारा 90 IPC के साथ पढ़कर चलाए जाते थे, जिसके अनुसार “तथ्य की भ्रांति” में दी गई सहमति वैध नहीं है। अक्सर धारा 417 IPC (छल) और कभी-कभी धारा 493 IPC भी जोड़ी जाती थी। BNS में यह एक अलग अपराध है, जो बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता। 1 जुलाई 2024 से पहले की घटनाओं पर आज भी IPC ही लागू होगी, भले ही FIR बाद में दर्ज हुई हो (संविधान का अनुच्छेद 20(1))।
व्यवहार में इसका क्या अर्थ है
शिकायत पर विचार कर रहे व्यक्ति के लिए निर्णायक सवाल शुरुआत के इरादे और सबूत के हैं, रिश्ता टूटने के नहीं। आरोपी के लिए अस्पष्ट और सामान्य आरोप, बिना कारण लंबी देरी, और उस समय के सबूतों, जैसे संदेश, लंबे समय का आचरण और धारा 183 BNSS के तहत दर्ज बयान, का अभाव, ऐसी कमज़ोरियाँ हैं जिन्हें अदालतें ध्यान से देखती हैं। और जहाँ वास्तव में धोखा हुआ है, वहाँ धारा 69 सही और गंभीर उपाय है। कानून की रुचि दोनों ओर एक ही है: धोखा, सहमति और सबूत, केवल दिल टूटना नहीं।
निष्कर्ष
धारा 69 BNS टूटे रिश्ते या शादी से इनकार को अपराध नहीं बनाती। यह एक सीमित और विशिष्ट गलत काम को दंडित करती है: ऐसे वादे या छल से सहमति लेना जो किए जाते समय ही झूठा था। प्रमोद सूर्यभान पवार और दीपक गुलाटी ने यह रेखा खींची; प्रदीप कुमार केसरवानी ने अदालतों को इसे लागू करने और आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग रोकने की स्पष्ट कसौटी दी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या शादी का झूठा वादा भारत में अपराध है?
हो सकता है। धारा 69 BNS के तहत छल से, या बिना निभाने के इरादे के शादी का वादा करके बनाया गया शारीरिक संबंध (जो बलात्कार की श्रेणी में न आता हो) दस वर्ष तक के कारावास से दंडनीय है। आपसी सहमति का रिश्ता जो बस टूट गया, अपराध नहीं है।
धारा 69 BNS में क्या सज़ा है?
दस वर्ष तक का कारावास और जुर्माना।
क्या हर टूटी सगाई या ब्रेकअप अपराध बन जाता है?
नहीं। अदालतें यह देखती हैं कि वादा शुरू से ही झूठा था और उसी के कारण सहमति दी गई। बाद में असफल हुआ रिश्ता अपने आप में धारा 69 BNS के दायरे में नहीं आता।
क्या शादी के झूठे वादे की FIR रद्द हो सकती है?
हाँ। उच्च न्यायालय धारा 528 BNSS (पहले धारा 482 CrPC) के तहत बेबुनियाद या परेशान करने वाली शिकायतें रद्द कर सकते हैं। प्रदीप कुमार केसरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा मामला रद्द करते हुए इसे “कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” कहा और ऐसी शिकायतें रद्द करने के लिए चार-चरणीय कसौटी तय की।
धारा 69 BNS बलात्कार से कैसे अलग है?
धारा 69 छल पर आधारित ऐसे शारीरिक संबंध को कवर करती है जो बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता। बलात्कार (धारा 63–64 BNS) वैध सहमति के पूर्ण अभाव पर आधारित है। धारा 69 उन स्थितियों के लिए है जहाँ सहमति दी तो गई, लेकिन झूठे वादे या अन्य छल से ली गई।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं। आपके मामले के तथ्यों के अनुसार सलाह अलग हो सकती है।






